पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति। तदहं भक्त्युपहृतमश्नामि प्रयतात्मनः।। ९.२६ ।।
"श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं, कि भक्त यथासाध्य प्राप्त जो भी प्रेमपूर्वक एवं शुद्ध मन से ईश्वर को अर्पण करते है, भगवान सहर्ष स्वीकार कर लेते हैं"
In the Bhagawad Gita, Lord Krishna tells Arjuna that when a devotee offers whatever is accessible to her or him with love and a pure mind; Bhagwaan (God) accepts the offering happily.